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Book ReviewTinka Tinka Dasna

पुस्तक समीक्षा: तिनका तिनका डासना

·      लेखक: डॉ. वर्तिका नन्दा

·      प्रकाशक का नाम: तिनका तिनका फाउंडेशन

·      प्रकाशन वर्ष: 2016

·      पृष्ठों की संख्या: 192

·    आईएसबीएन: 978-93-5265-729-2

·      पुस्तक का मूल्य: 500

लोग अक्सर सोचते हैं कि एक तिनके यानी एक मामूली से कण से किसी को क्या फर्क पढ़ेगा लेकिन जब वही कण एक-एक करके आपस में मिलते हैं तो एक तस्वीर उभरकर बाहर आती है। तिनका तिनका डासना वही उभरी हुई तस्वीर है।

तिनका तिनका डासना जेल के बंदियों के दिल की तस्वीर है। इसका उद्देश्य वहां रहने वाले लोगों को उनके दर्द से बाहर निकालकर उन्हें उनके सपनों की ओर अग्रसर करना है किताब एक और उद्देश्य इस समाज को आईना दिखाना और न्यायिक व्यवस्था से मानवीय होने की प्रार्थना करना।

इस किताब को 9 हिस्सों में विभाजित किया गया है। किताब का आरंभ जेलों पर लिखी गईं रिपोर्टों से किया गया है। वैसे तो इस किताब का मुख्य केंद्र डासना जेल है। परंतु इस किताब का पहला दरवाजा भारत की उन अनेक जेलों का एक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें कुछ कविताएं भी लिखी गई हैं। जो वर्तिका नन्दा की अन्य पुस्तकों रानियाँ सब जानती हैं, थी. हूँ.. और रहूँगी…से ली गईं हैं।

किताब के एक हिस्से में लेखिका ने लिखा है:

इस किताब का मकसद इन कैदियों के हाथों में एक दीया सौंपना है लेकिन साथ ही मीडिया और कानून तक उस प्रार्थना को पहुंचाना भी कि हर कैदी इंसान है और परिस्थितियां इंसानों के साथ ही उठापटक किया करती हैं। इस किताब के हर पन्ने के जरिए उस समाज को देखिए जिसे जल्द न्याय की ज़रूरत है और जो मुख्यधारा में लौटना चाहता है। यहां सोचना यह भी है कि सज़ा के बाद भी कैद काटते या फिर सज़ा के बाद बाहर आने के बाद भी समाज क्या इन लोगों को उस आसानी से स्वीकार कर पाता है जिसके वे जायज़ तौर पर हकदार होते हैं? 

* दूसरे हिस्से में उन 5 जिन्दगियों की कहानी हैं जो आजीवन कारावास पर हैं। जेल में आने के बाद कैसे उनका जीवन बदला, कैसे सबने अपनी नई परिभाषा रचने की कोशिश की और अपने आपको उस माहौल में देखा। इसमें इन्ही 5 जिन्दगियों की दास्तान है।

* तीसरे हिस्से में जेल में उम्मीद के दीयों को योग, संगीत, पेंटिंग, कलम, और नई तकनीक के जरिए कैसे अपनी जिन्दगियों में रोशनी फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। हर एक दिया जिन्दगियों में बखूबी रोशनी दे रहा है।

* चौथे हिस्से में उन अधिकारियों के बारे में जिन्होंने अपनी कोशिश का तिनका तिनका जोड़कर जेल के बन्दियों की जिंदगी को बेहतर बनाया है। यह वह लोग हैं जो अधिकारी हैं। इनकी कोशिश बंदियों के दिल पर छपी है। शायद इनकी इन्ही कोशिश के तिनकों के जरिए जेल में जीवन संभव है। इन्ही से जेल में जीवन है।

* पांचवां हिस्सा बताता है कि कैसे तिनके आपस मे जुड़े और तिनका तिनका डासना के प्रयोग इतने सफल हुए। इन लोगों ने मिलकर तिनकों को जोड़ा है, और बन्दियों के अन्दर कुछ कर गुजरने का साहस जगाया है।

* छठे हिस्से में बंदियों की लिखी हुईं कवितायेँ हैं और कलम के जरिए बंदियों ने अपने अन्दर छिपे दर्द को बाहर कागज पर लाने का एक खूबसूरत प्रयास किया है।

* सातवें हिस्से में वे कविताएं हैं जिन्हें बंदियों ने जेल में आने के बाद लिखा है। इन कविताओं को साहित्यिक मापदंडों पर कसने पर भले ही उत्कृष्ट दर्जे का करार न किया जा सके लेकिन इनमें छिपा दर्द सच्चा है।  

* आठवां हिस्सा उन लोगों के बारे में बताता बताता है जो आज भी जिन्दगियों को अंधेरे में धकेलने का काम कर रहे हैं।

* इस किताब के अंतिम और नवें हिस्से में वह गीत लिखा गया है जिसे खुद वर्तिका नन्दा ने अपने हाथों से रचा है। जिसे जेल के बन्दियों ने ही गया है। और इसके जरिए से सुरों के संगम को बाखूभी बंदियों के दिल तक पहुंचाया है।

तिनका तिनका डासना में एक केलन्डर, कविता, गीत, दीवार, पर की गई 3D पेंटिंग की जरिए बंदियों की जिन्दगियों में उजाला और उन्हें नए सपने देखने का साहस प्रदान करने की एक अनूठी पहल की गई है। और खुशनसीब हूँ कि इस किताब के माध्यम से मुझे जेल के अन्दर सांस ले रहे तमाम जिन्दगियों को करीब से जानने का मौका मिला।

किताब के एक हिस्से में लिखा है कि:

तिनका तिनका डासना ने कोशिश की के सबके हाथ में उम्मीद का कोई चिराग आजाए फिर किसी ने अपनाया और संगीत, किसी ने थमा रंगों का ब्रश और बन गया तिनका तिनका डासना। हमने चाहा है कि न बंदियों की रातें अंधेरी रहें और नही उनके दिन।

यही है तिनका तिनका डासना

दिन बदलेंगे यहाँ भी, पिघलेंगी यह सलाखें भी

ढ़ह जाएंगीं यह दीवारें, होंगी अपनी कुछ मीनारें

टूटे फिर भी आस ना, यह है अपना डासना।

(यह वर्तिका नन्दा का लिखा गीत है, जिसे डासना के बंदियों ने गया है और अब यह जेल का परिचय गान है।)

यह गीत तिनका तिनका डासना के तिनके की तस्वीर स्पष्ट रूप से उभरता है। और इसी जीत के साथ मैं अपनी यह यात्रा यहीं समाप्त करती हूँ।

समीक्षक का परिचय: मेहविश राशिद

संपादन: हर्ष वर्धन

 

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