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Tinka Tinka Editorial

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच खुली जेलों का मसला

वर्तिका नन्दा

तिहाड़ जेल से लगे हुए तिहाड़ हाट में मनु शर्मा को हर रोज शाम देखा जा सकता है। वह तिहाड़ जेल के बहुत से समारोहों का हिस्‍सा बनता है और सलाह देता है। शाम के समय जेल के लगे परिसर में वह भी बाकी बंदियों की तरह सामान को बेचता है। मनु शर्मा 1999 में हुए जेसिका लाल हत्‍याकाण्‍ड के मामले में तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास पर है। अब उसकी सजा अपने आखिरी चरण पर है। सजा के खत्‍म होने से पहले मानसिक तैयारी के इस दौर में उसे बाकी कुछ बंदियों के साथ खुली जेल में रखा गया है। अभी कुछ समय पहले तक नैना साहिनी हत्‍या के मामले में जेल में बंद सुशील शर्मा भी इसी खुली जेल में बंद था।

जस्टिन मदन बी लोकूर के साथ वर्तिका नन्दा

इस समय भारत में कुल 54 खुली जेल हैं। इसी खुली जेल को लेकर सितम्बर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया कि पूरे देश में हर जेल में खुली जेल के काँसेप्‍ट को जल्‍दी से जल्‍दी लागू किया जाये।

 

दरअसल खुली जेल एक ऐसी जेल होती है जिसमें जेल के सुरक्षा नियमों को काफी लचीला रखा जाता है। ऐसी जेल बड़ी जेल का ही एक बाहरी हिस्‍सा होती है जो सलाखों से काफी हद तक आजाद होती है। ऐसी जेलों में रहने वाले बंदी दिन के समय बाहर कहीं भी जा सकते हैं, लेकिन उन्‍हें एक निश्‍चित समय के बाद शाम में उसी जगह पर लौटना होता है। ऐसी जगह में बंदी के भागे जाने के डर को ध्‍यान में रखते हुए किसी तरह की सुरक्षा का दबाव नहीं रखा जाता। इन जेलों में बंदियों को आत्‍मानुशासन और खुद अपनी रोटी अर्जित करने पर जोर दिया जाता है। इसमें एक बड़ी बात यह भी है कि इन बंदियों से बाहर के लोग आकर मिल सकते हैं। ऐसे में यह बंदी भी धीरे-धीरे अपने आप को समाज में लौटने के लिए तैयारी का अवसर पा लेते हैं। इस तरह की खुली जेल का मकसद जेलों में बढ़ती भीड़ पर काबू पाना बंदियों को उनके अच्‍छे व्‍यवहार के लिए एक मौका देना और उन्‍हें समाज में लौटने के लिए फिर से तैयार करना होता है।

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दुनिया में पहली खुली जेल स्‍वीटजरलैंड में 1891 में बनी थी। उसके बाद अमरीका में 1916 में और ब्रिटेन में 1930 में बनाई गई। साल 1975 आते-आते अमरीका में खुली जेलों की संख्‍या 25 हो गई जबकि इंग्‍लैंड में 13 और भारत में 23 । भारत में पहली खुली जेल 1905 में बम्‍बई में बनी और इसमें थाणे केन्‍द्रीय जेल, बम्‍बई के खास बंदियों को रखा गया लेकिन इस खुली जेल को 1910 में बंद करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में अनाधिकृत तौर पर खुली जेल का पहला कैंप 1953 में बनाया गया। इसका मकसद वाराणसी के पास चंद्रप्रभा नदी पर एक बांध बनाना था। इस कैंप की जबरदस्‍त सफलता को देखते हुए 1956 में उत्‍तरप्रदेश के शहर मिर्जापुर में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया। मौजूदा समय में खुली जेलों में करीब 100 से 1000 तक बंदी रखे जाते हैं। लेकिन डकैती और फर्जीबाड़े जैसे अपराधों में लिप्‍त रहे बंदियों और महिलाओं का इस जेल के लिए चुनाव नहीं किया जाता। यहां एक बात खास है कि 2010 में पुणे में देश की पहली महिला खुली जेल को शुरू कर दिया गया।

 

खुली जेल हाल के दिनों में फिर से चर्चा में आ गई है क्‍योंकि जस्टिस मदन लोकूर और दीपक गुप्‍ता ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि अब भारत में खुली जेल की तादाद को बढ़ाना होगा। अभिनेता संजय दत्‍त की जारी की हुई जनहित याचिका के वजह से इस फैसले को लिया गया है। संजय दत्‍त ने महाराष्‍ट्र की जेलों में पांच साल का समय गुजारा था। जनहित याचिका को संज्ञान में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 11 निर्देश दिए हैं। इनमें जेल सुधार को लेकर सभी राज्‍यों को तुरंत कार्यवाही करने के लिए कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अब समय आ गया है कि सभी राज्‍य खुली जेलों के सिद्धांत का गंभीरता से अध्‍ययन करें और उसे अमल में लायें। इस फैसले में शिमला और दिल्‍ली की तिहाड़ जेल का खास उल्‍लेख किया गया है। यह बात गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में सोमेश गोयल और दिल्‍ली में विमला मेहरा और सुधीर यादव जैसे प्रभावशाली आईपीएस अफसरों के कार्यकाल में खुली जेल और अर्धखुली जेल काफी विकसित हुई हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के इस 11 सूत्रीय निर्देश  में स्‍वतंत्रता के अधिकार, जेलों के अंदर मानवीय व्‍यवहार, जेलों में अप्राकृतिक मृत्‍यु वाले बंदियों के परिवारों को मुआवजा देने और अकेलेपन और कैद से निपटने के लिए काउंसलिंग पर विचार करने को भी कहा गया है। कोर्ट ने परिवारों से मुलाकात मुलाकात, फोन के जरिए संपर्क को भी बढ़ाने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही अकेलेपन को कम करने और मानसिक स्थिरता में सुधार के लिए समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के जरिए बाहरी दुनिया से जोड़ने की जरूरत

भी बताई है।

कोर्ट ने कैदियों के साथ व्यवहार के न्यूनतम स्तर के बारे में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ओर से अपनाए गए मंडेला नियमों का भी जिक्र किया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि परिवार और मित्रों से कटे हुए कैदियों के जेल से बाहर रहने वाले लोगों की तुलना में आत्महत्या करने के 50 प्रतिशत अधिक अवसर होते हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में अफसरों के लिए ट्रेनिंग और बंदियों के लिए उनके अधिकारों पर कार्यक्रम आयोजित करने पर भी जोर दिया है। इसके अलावा माहिला और बाल विकास मंत्रालय से भी कहा गया है कि वह जेलों में बच्‍चों और महिलाओ की देखभाल को लेकर अपने काम को आगे बढ़ाए। यहाँ यह जोड़ना जरूरी है कि देश भर में करीब 1800 बच्‍चे अपनी माता या पिता के साथ जेल में रहते हैं और उन्‍हें सिर्फ 6 साल तक ही उनके साथ जेलों में रहने की इजाजत होती है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्‍यूरो के मुताबिक भारत में पिछले 15 सालों मे जेलों में बंद होने वाली महिलाओं की संख्‍या में 50 प्रतिशत की बढोतरी हुई है। इसी तरह पिछले एक दशक में 477 महिला बंदियों की मौत जेल के अंदर हुई है।

 

बेशक सुप्रीम कोर्ट का ये निर्देश मील का पत्‍थर साबित होगा लेकिन इसे लागू करना इतना आसान नहीं लगता। पूरे देश में इस समय 1382 जेलें हैं जिनमें से महिलाओं के लिए सिर्फ 18 ही हैं। जेलें सामाजिक और प्रशासनिक दोनों ही स्‍तरों से अनदेखी का शिकार होती हैं। जस्टिस मुल्‍ला और जस्टिस कृष्‍णा अय्यर रिपोर्ट में दी गई सलाहें आज भी पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई हैं। जेलों में करीब 80 प्रतिशत बंदी विचाराधीन है और न्‍यायिक प्रक्रिया अक्‍सर बहुत लंबा समय लेती हैं। इससे जेलों में भीड़ का बढ़ना स्‍वभाविक है। देश की जेलों में अपनी संख्‍या से कम से कम 18 प्रतिशत ज्‍यादा बंदियों का मौजूद होना चौंकाता है। प्रशासनिक स्‍तर पर जेलें राज्‍यों के अधीन आती हैं। आईपीएस अधिकारी अक्‍सर जेलों मे नियुक्‍त होना पसंद नहीं करते और खुद जेल मंत्री भी जेलों को लेकर अ-गंभीर बने रहते हैं। भारत में जेलों को सुधार गृह कहा जाने लगा है लेकिन ऐसा कहने भर से काम पूरा नहीं होता। जेलें अपराधियों के लिए बड़े अपराध बनने का वर्कशॉप भी बनती रही हैं। विचाराधीन और सजायाफ्ता या फिर एक बार अपराध करके आये और बार-बार अपराध करने वाले बंदियों को अलग-अलग रखने का प्रावधान न होने से जेलें बाहर की दुनिया के लिए खतरे का कारक बनाती हैं। बाहर  की दुनिया जेल के बंदियों के फैशन शो को देख कर कुछ देर के लिए तालियाँ भले ही बजा ले लेकिन इससे समस्या का निदान नहीं होता। जेलों को नए सिरे से बदलाव की जरूरत है जिसके लिए प्रसाशनिक और न्यायिक स्तर पर कोशिशो के अलावा साहित्य और कला का भी अपना योगदान हो सकता है। जब तक हर स्तर पर संवाद शुरू नहीं होगा, तब तक हालत बदल नहीं सकेंगे ।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्देश पर सभी राज्‍यों से दिसंबर तक रिपोर्ट मांगी है। लेकिन इस रिपोर्ट को लागू करने के लिए नीयत भी बने, इसके लिए कोई नियम नहीं बनाया जा सकता। जेलें एक टापू की तरह संचालित होती हैं। और सन्‍नाटे में पलती हैं। जेल से बाहर आने पर अपराधी फिर से अपराध की दुनिया में न लौटे,इसे सुनिश्‍चत करने के लिए उन संस्‍थाओं को संकल्‍प लेना होगा जिन पर य‍ह जिम्‍मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक रास्‍ते को खोला है लेकिन इस रास्‍ते में चट्टानों की कोई कमी नहीं।

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