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Tinka Tinka Editorial

पिता, दीया और तिनका तिनका : वर्तिका नन्दा

पिता, दीया और तिनका तिनका

पिता के नाम एक दीया : वर्तिका नन्दा

ऐसी दीवाली कौन समझेगा। अस्पताल के आईसीयू के एक कोने में बिना बाती का एक दीया-तिनका तिनका। बाहर की दुनिया क्या जाने कि किसी के जाने की जल्दी के बीच एक अनजला दीया भी कोई रौशनी ला सकता है। उस रात जब किसी तरह चलते नेटवर्क के बीच जाने-अनजाने लोगों के दीपावली के संदेश आ रहे थे, मेरे लिए किसी को भी यह बताना मुश्किल था कि बुझती लौ के बीच अस्पताल की दीवाली कैसी हो सकती है। उस रात आस-पास नर्सें थीं, डॉक्टर थे, प्रार्थनाएं करते मरीज थे या फिर उनके रिश्तेदार। उनकी एक सिमटी दुनिया थी और बाहर थी-दीवाली।

आपके जाने ने जिंदगी के सबसे बड़े सबक दिए। कितना सीखा। चुप्पी के नए मायने जाने। यह समझा कि सुख और दुख-इन दोनों का ही चरम बांटने के लिए कतई नहीं होता। वह सिर्फ महसूस करने के लिए होता है। रिश्तों के लिए शब्द नहीं होते। रिश्तों के लिए अनुभूति होती है। आपने यह बात हम सबसे कहीं पहले और कहीं ज्यादा सलीके से समझ ली। हम ही पीछे रह गए।

हमने सीखा रिश्ते शोर नहीं होते। उनकी डोर को बस थामना होता है। इन दोनों भावों के बीच बिना भीड़ के जीना ही असल का जीना है। आपके बीमार होने के दौरान मैंने दो ही जगह मदद मांगी और उस मदद ने आपकी बची सांसों को बचाए रखा। बाहर की दुनिया को हमने अंदाजा भी नहीं होने दिया कि हम इन दिनों अस्पताल में हैं, कि कई बार फोन की आवाज टूटती क्यों है, कि कई बार मेरी आवाज भीगती क्यों है, कि मैं सेमिनार या किसी प्रोग्राम में क्यों नहीं जा रही और अगर कहीं गई भी तो अपनी मौजूदगी को मैंने सीमित क्यों रखा।

मेरे पास सवालों का जवाब देने का वक्त नहीं था। वैसे भी इतने सालों में मेरे हर सवाल का जवाब आप थे और बाकी सवाल कोई मायने नहीं रखते थे।

7 महीनों में अस्पताल में कई बार उम्मीदें उतरीं, फिर चढ़ीं और फिर उतरीं। इस दौरान मैंने इंसान से इंसान के रिश्ते के नए चेहरे देखे। अपनेपन की नई छांव देखी। अपनी मां, बहन और मासी की सेवा की मखमली छुअन को देखा। उम्रदराज नानी की अनकही बेचैनी देखी। रेगिस्तान में तालाब को बनते देखा। सेवा की पराकाष्ठा देखी। रिश्तों की करीबियत समझी।

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कई मरीजों या उनके रिश्तेदारों से परिचय होने लगा और समझ में आया कि हर दुख का रंग एक ही होता है। आपके अपनेपन से डॉक्टर और नर्स भी आपसे जुड़ने लगे और जाती हुई उम्मीदों के बीच भी मैंने उम्मीदों को मुट्ठी में कस कर दबाए रखा।

जाने वाले दिन उस सुबह गहरी नींद में जब आप सपने में दिखे और एकदम चलने की जिद्द करने लगे तो मैंने उस संकेत को आपका ठीक होना समझा। मैं शायद गलत थी। शायद सही भी। आपने ताकीद कर दी थी। आप उसी पल अपनी यात्रा पर निकल गए थे।

उस दिन मैं कॉलेज की ड्यूटी पर थी। मैं निकलने से पहले आईसीयू आई थी। आपसे पूछ कर गई थी। आपने कोई जवाब नहीं दिया था। आप वेंटिलेटर पर थे। मैंने आपके मौन के बीच ही जाने का फैसला लिया। मुझे पेपर के काम से नार्थ कैंपस जाना था। मैं वहां लगातार काम करती रही। शायद आपको अंदाजा था कि दफ्तर के काम से मेरा जाना जरूरी है लेकिन तब तक समय ने अपना फैसला लिख दिया था। मां के तीन फोन आए। पहले दो यह बताने के लिए कि समय कम है। मैं तब तक अपना काम खत्म कर चुकी थी। दोनों फोन मुझे विचलित करने के लिए काफी थे। फोन के आने और मेरे पहुंचने तक ट्रैफिक की भीड़ और आपकी सांसों के बीच एक लंबी दूरी बिछी थी। मैं ऑटो में थी। फिर एक पुराने साथी से मैंने मदद मांगी और उनकी गाड़ी राजघाट तक आ गई। तेज गाड़ी में बैठे हुए भी मेरी सांसें बेदम थीं। चलती सड़क क्या जाने कि सड़कों पर चलते लोग हमेशा किसी सफर पर ही नहीं होते। कई बार वे सफर के अंत होते पल के हमराही होते हैं। लेकिन सड़क को और बेतरतीब चलती कारों को इसका क्या इल्म। जब तीसरा फोन आया तो पता चला कि सब सिमट गया। अब मेरी आंखें किसी प्रार्थना में बंद थीं। जब तक मैं वहां पहुंची, वेंटिलेटर हट चुका था। शरीर पर चादर थी। पर चेहरा खुला था। एकदम शांत जैसे आपने आध्यात्मिक सुख को पा लिया हो।

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यह एक अनोखी विदाई थी। यह 7 महीने जिंदगी का सबसे बड़ा सबक। इसमें मैंने मौन के कई सबक सीखे और भीड़ से अलग रहने के कई मतलब। अस्पताल के समय में ही जब मैं आपके करीब होती थी और कहीं किसी प्रोग्राम के लिए फोन आता था और बार-बार कटता जाता था, तब भी मैं यह नहीं बताती थी कि मैं इस समय आपकी देखभाल पर अस्पताल में हूं। बाहर की दुनिया नहीं जानती थी कि हर रोज अस्पताल में ही नहाने के बाद आईसीयू से होते हुए कॉलेज जाकर शुरु के कुछ घंटे पढ़ाने तक मैं खाली पेट ही होती थी। अस्पताल खिदमत करने वाले को खुद अपनी खिदमत करने का मौका नहीं देती। लेकिन तब मैंने यह भी जाना कि इंसान के तौर पर यह भी समझना जरूरी है कि रोज हमसे मिलते लोग भी जाने किस यात्रा से आते होंगे, जाने किस मुकाम पर जाते होंगे। हर कोई नहीं बताता उसका पड़ाव क्या था, कहां था। मैंने यह भी जाना कि दुख को जीने का भी एक सलीका होता है। दुख एकाकीपन मांगता है। शोर से भरी बाहर की दुनिया से उसे जोड़ने कोई मायने नहीं। बाहर की दुनिया किसी और यात्रा में होगी।

जाना भी आपसे ही सीखा। आप भीड़ नहीं चाहते थे, कोई औपचारिकता नहीं, कोई दिखावा नहीं। कई साल पहले ही आप अपने शरीर को दान करने का फॉर्म भर चुके थे लेकिन आपके वेंटिलेटर पर होने की तकनीकी वजहों से हम इस इच्छा को पूरी नहीं कर सके। लेकिन आपकी इच्छा के अनुरूप हमने इलेक्ट्रिक क्रिमेटोरियम में ही आपको विदा दी। रस्मों को सहज और स्वाभाविक रखा। दिल्ली के बड़े नामों को बटोरने की तिनका भर जुगत नहीं की। हमें इस विदाई को सादा और शालीन रखना था। भारी नामो और खाली दिलों को जमा करने की दिल्ली की फितरत से बचना था। एक बड़े समाज को आपके जाने की सूचना बाद में दी गई ताकि औपचारिकताओं का ताना-बाना आखिरी पलों को नाटकीय न बनाए। आपकी अंतिम क्रियाएं हम दो बहनों ने की। हमने उस बंधन को तोड़ा जो कभी समाज ने ही गढ़ा होगा।

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जाते-जाते आप महादान कर गए। आपने कुछ साल पहले ही तिनका तिनका की नींव रख दी। आपने जेलों में बंद लोगों को एक बेहतर सोच और जिंदगी से जोड़ने के लिए तिनकों के कई दीये पिरो दिए। कौन क्या जाने कि कैसे आपने पिछले सालों में जेलों के मेरे कतरे-कतरे काम को पूरे मौन और मेहनत के साथ पिरोया। कौन यह भी जाने कि अब तक का जेलों का सबसे बड़ा काम अस्पताल में ही हुआ। मेरी अगली कोशिश की शुरुआत अस्पताल में ही हुई और उसका समापन भी। दुनिया शायद ही कभी समझ पाए कि अस्पतालों की अलग-अलग सीढ़ियों पर जेलों की एक अनूठी कहानी को किस दर्द के साथ लिखा गया।

आपके लिए यह समय अंत को करीब से महसूस करने का था। आपको इत्मीनान से जाना था। हमने आपको वैसे ही जाने दिया जैसा आप चाहते थे।

मैंने सीखा कि महानगरों के बड़े किरदारों के पास अस्तपालों के लिए कोई समय नहीं। अस्पताल और जेल सिर्फ व्यक्तिगत कामों पर ही याद किए जाते हैं। लेकिन आपके सरोकार खाली नहीं जाएंगे। मेरे पास तिनका तिनका के लिए कोई आर्थिक सहयोग नहीं है लेकिन साफ नीयत है, पक्का मन है। आपकी याद में जेलों और अस्पतालों पर मुझसे जो भी होगा, वह किया जाएगा। यह बात क्या देहदान से कम है। यह उससे कहीं ज्यादा है क्योंकि अब हम और आप मिलकर बहुत-से जीवन बचाने की कोशिश करेंगे।

पिता के जाने की कोई जोरदार आवाज नहीं होती। बस,एक सन्नाटा पसर जाता है जो कभी नहीं जाता। यह सन्नाटा अब आजीवन रहेगा। आपकी तस्वीर अब ड्रॉइंग रूम में है। हम उससे खूब बात करते हैं। तस्वीर पर एक हार है। यह हार सदाबहार रहेगी क्योंकि इसमें चिंतन, साहस और दृष्टि है।

इस तस्वीर के पास एक दीया है और मैं उसकी बाती। यही मतलब मेरे नाम का भी तो है। मैं उसकी बाती बनी रहूंगी। आप जैसी विदाई तो खुद समय ने भी कम ही देखी होगी। हमने देखी।

यह विदाई एक नए अध्याय का आगमन है।

श्रद्धांजलि।।।

वर्तिका नन्दा

नवंबर, 2017

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