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Book ReviewTinka Tinka Dasna

दर्द के अंधेरे में झिलमिलाती उम्मीद की एक किरण – तिनका तिनका डासना

डॉ. प्रीति प्रकाश प्रजापति

हिंदी विभाग, लेडी श्री राम कॉलेज फॉर वीमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय

नई दिल्ली

‘तिनका तिनका डासना’ विषय सामग्री, लेखकीय व्यक्तित्व और अभिव्यंजना शैली तीनों ही दृष्टियों से वर्तिका नंदा की एक महत्त्वपूर्ण व उल्लेखनीय पुस्तक है।यदि विषय को लें तो यह सामान्य से हटकर इस अर्थ में है कि यह उस जनसमुदाय के उन जीवन पृष्ठों को हमारे समक्ष खोलता है जो सामान्यतया बंद दीवारों के बीच पड़े-पड़े बीतते समय के साथ गलते चले जाते हैं। जिन पर लिखी इबारत अनचीन्हीं ही रह जाती है। ये उपेक्षित जीवन उन जेलवासियों के हैं जो हाशिए के समाज  की परिधि से भी छिटककर एक नए हाशिए में तब्दील हो जाते हैं। जिनकी सिसकियाँ, हिचकियाँ और आर्त पुकार जेल की दीवारें सुनती तो हैं पर चुपचाप अपने सीने में दफ्न कर देती हैं। जहाँ तक लेखक की स्थिति और सरोकार का प्रश्न है तो जेल की जीवन पद्धति को यथार्थपरक समग्रता में उभारने वाला अपने आप में यह एक अनूठा प्रयास है, जो स्त्री लेखन के एक नये आयाम को हमारे समक्ष उद्घाटित करता है। अनुभव और व्यवहार जगत से चिंतन और संवेदना तक एक लम्बी यात्रा और अंत में संवेदना का लेखन में रूपांतरण। इस कष्टकर एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया को एक सार्थकपरिणति प्रदान करना लेखिका के अदम्य साहस, प्रतिबद्धता, लगन और सर्जनात्मक क्षमता का प्रमाण है। अतः चेतना को झकझोरने वाली यह विचारोत्तेजक पुस्तक एक श्रेष्ठ उपलब्धि है।

लेखिका के अपने शब्दों में, “इस पूरी किताब को साहित्य और पत्रकारिता के कुछ तय मापदंडों से हटकर लिखा है। जो दिखा, जो देखा, उसे लिखा। यहाँ खबर में कहानी है, कहानी में खबर है और दोनों में पूरा सच है। दोनों में इंसान है। जिन्होनें जेल नहीं देखी, उनके लिए यहाँ जेल के तकरीबन हर अंश को मैनें समेटने की कोशिश की है। (तिनका तिनका डासना, पृष्ठ 13)

लेखिका अपराधी समाज के बीच स्वयं जाकर उनसे सीधे संवाद का साहस जुटाती हैं। इस संवाद के माध्यम से वे परस्पर विश्वास का सेतु निर्मित कर, उनके मर्मस्थल की थाह लेती हैं। एक ओर जहाँ वे पूर्वाग्रह मुक्त होकर फैसले का इंतज़ार कर रहे अपराधी मान लिए गए लोगों के मनोविज्ञान को समझने का प्रयास करती हैं, तो दूसरी ओर पीड़ा, पश्चाताप, विवशता, आक्रोश, अपराध-बोध से उद्वेलित हृदयों की जटिल मनःस्थिति से गहन संवेदनात्मक धरातल पर जुड़ते हुए सच्चाई और ईमानदारी के साथ उसे व्यक्त भी करती हैं जो उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, संवेदनशीलता व सकारात्मक सोच का प्रमाण है।

वर्तिका ने इन विषादयुक्त हृदयों के अंधकारपूर्ण कोनों में झाँकने के साथ-साथ इनमें छिपी आशा, आकांक्षा, आस्था, सहृदयता, प्रेम और उत्साह जैसी सकारात्मक वृत्तियों को लक्षित किया है। यही नहीं, उनमें विद्यमान मनुष्यता के उस निर्मल स्रोत को सर्जनात्मकता में ढालकर उन्हें सकारात्मक ऊर्जा में रूपांतरण के लिए प्रेरित भी किया है।

“इस किताब में विशाखापत्तनम के रहने वाले विवेक स्वामी की बनाई पेंटिंग भी प्रमुखता से शामिल है। वह भी डासना में बंदी था।

“मेरे स्कैच करके दिए गए आइडिया को उसने जिस लगन और सूझबूझ के साथ बनाया, वह तारीफ़ से परे है।”

***

“दीवार पर बनाई गयी यह पेंटिंग करीब 10 साल तक इसी तरह बनी रहेगी। इस पेंटिंग का एक सिरा अँधेरे में है जहाँ चाँद और सितारे दिन में जगमगाते दिखेंगे। दूसरे सिरे में उस गाने का एक अंश है जिसे मैनें लिखा है पर बंदियों ने गाया है।मेरा मन था कि यह दीवार इस जेल के लिए शक्ति-पुंज बन जाए। इसकी परिकल्पना यही सोच कर की गई थी कि यह बंदियों को चौबीसों घंटे किसी भरोसे से जोड़े रखे। शायद ऐसा ही हुआ भी है।” (वही, पृष्ठ 15-16)

इस पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे यह महसूस हुआ जैसे मैं एक लम्बी कथात्मक कविता पढ़ रही हूँ, जिसमें संवेदना का सघन प्रवाह है, तथ्यों से दृश्यों में रूपांतरित होते मर्मस्पर्शी बिम्ब हैं जिनके मूल में अनुभव और विचारधारा के घात-संघात से उत्पन्न मानवीय सरोकारों से उत्प्रेरित, सचेत, सूक्ष्म और पैनी आलोचनात्मक दृष्टि सक्रिय है। लेखिका का रचनात्मक संस्कार पत्रकार और कवयित्री दोनों रूपों से मिलकर निर्मित हुआ है। इसी से जहाँ एक और संवेदना तथ्यों के ठोस धरातल पर प्रवाहित हुई है, वहीँ दूसरी ओर संवेदना के आर्द्र संस्पर्श से तथ्य और आँकड़े जीवंत सत्य के रूप में उभर पाए। कोरी भावुकता और रूखे तथ्य वर्णन के स्थान पर यहाँ जेल जीवन का ऐसा मार्मिक यथार्थ चित्रण है जिसमें सच इकहरा और एकांगी रूप में न आकर परत-दर-परत खुलता चला जाता है।

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“यहाँ हर वो बात ज़रूरी है जिसे आज़ादी का कायदा बेमानी मानता है।”

जो अंदर है, वो बाहर से आये इस ‘अपने’ को अपने कुशल-मंगल होने का भरोसा दिलाता है। शब्द बार – बार कहते हैं – वह ठीक है पर शरीर और आँखें वैसा कह नही पातीं। जो बाहर है, वह भी कहता है कि सब ठीक है पर उसका भी न तो शरीर और न ही आँखें वैसा कह पाती हैं। शरीर झूठ नहीं कह पाता। आँखें भी सच छुपा नहीं पातीं। आने वाला उम्मीद भरे शब्दों की पोटली लाता है । सुनने वाला उस पोटली से थोड़ी देर खेलता है। पोटली दोनों के बीच कहीं छूट जाती है।” (वही, पृष्ठ 29)

प्रत्यक्ष चित्रण का केंद्र जेल के भीतर का जीवन है किन्तु पृष्ठभूमि के रूप में अप्रत्यक्षतः बाह्य सामाजिक जीवन का बहुआयामी चित्र भी उभरता जाता है। लेखिका ने इस पुस्तक में अपराधों की रिपोर्टिंग करने वाली मीडिया की भूमिका पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए हैं। वह मीडिया जो सदा सच को जनता के सामने लाने का दावा करती रही है जो न्यायालय के फैसले से पूर्व ही अपने निष्कर्ष देने लगती है। सनसनी उत्पन्न करने की होड़ में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मनगढंत कहानियाँ परोसती है। अपने गैर जिम्मेदाराना आचरण से लोगों के जीवन को किस प्रकार लांछन और अपमान के यातनापूर्ण अन्धकार में धकेल देती है। इस पर लेखिका की बेबाक टिप्पणी देखी जा सकती है –

“कहीं बात मीडिया की भी करनी होगी। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में मीडिया ने बेशक संवाद को पहिए लगा दिए हैं और देश के विकास को भी। मीडिया सक्षम, सबल और समर्थ हुआ है लेकिन कई बार अपने रोल में मीडिया चूका भी है। किसी खबर को देने की हड़बड़ी। कहीं कोई खबर पहले छीन न ले – इस भागमभाग में बहुत बार जिंदगियाँ छिन जाती हैं।” (वही, पृष्ठ 12)

लेखिका ने आरुषि हत्याकांड के आरोपी उसके माता-पिता तलवार दम्पति के विडम्बनापूर्ण जीवन का चित्रण करते हुए इस दारुण स्थिति  को बड़ी साफगोई के साथ उजागर किया है। राजेश की भाभी वंदना का जिक्र करते हुए वे लिखती हैं –

“वे मीडिया से संपर्क बनाए रखने की कोशिश करती हैं ताकि खलिश कहीं तो कम हो । बार-बार यह अहसास गहराता है कि इस मामले की रिपोर्टिंग में मीडिया अपने तयशुदा रोल से कहीं आगे और कहीं जल्दी निकल गया।”

* * *

“वंदना को कचोटता है कि लोगों को यह कहाँ याद कि सरकार ने भी मीडिया के एक हिस्से को गैर-जिम्मेदाराना माना था। लोगों को शायद सिर्फ वही याद है जो उन्हें परोसा गया था। तस्वीरों से जुडी याददाश्त कब और कैसे मिटेगी, इसकी चुभन उन्हें चैन नहीं लेने देती।” (वही, पृष्ठ 59)

नूपुर और राजेश तलवार दोनों पति-पत्नी सन 2008 में अपनी इकलौती पुत्री आरुषि और नौकर हेमराज की हत्या के इलज़ाम में डासना जेल में बंदी रहे। लेखिका द्वारा वर्णित दोनों के व्यक्तित्व, स्वभाव और जेल में उनके रहन-सहन को देखकर एक शातिर और खूंखार अपराधी के रूप में, वह भी अपनी पुत्री के हत्यारों के रूप में उनकी कल्पना कर पाना जैसे सहसा विश्वास ही नहीं होता। लेखिका हमारे समक्ष मानवीय सरोकारों व संवेदना से युक्त वह नजरिया रखती है जिसकी रौशनी में हम सच को नए सिरे से जानने और तलाशने के लिए बेचैन हो उठते हैं। ऐसा मह्सूस होने लगता है जैसे जो तथ्य सामने आये हैं या लाए गए हैं वह हत्या की इस गुत्थी को सुलझाने के लिए नाकाफ़ी हैं। न्यायतंत्र को और अधिक तत्पर, सक्रिय व दुरुस्त होने की जरूरत है।

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राजेश और नूपुर तलवार के अतिरिक्त लेखिका ने इस पुस्तक में कुछ और कैदियों के विषय में भी चर्चा की है, जिनमें से कुछ के नाम हैं –

(1) सुरिंदर कोली

(2) रवींद्र कुमार

(3) राजेश झा

(4) विजय बाबा

(5) रमेश

(6) आशाराम गिरि

(7) प्रशांत

(8) विवेक

इनमें से अधिकतर लोग हत्या के मामले में लम्बी सजा काटने वाले कैदी हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि इनमें से अधिकांश मानसिक वेदना झेलते हुए भी जेल में अपनी सकारात्मक भूमिका में सक्रिय रहते हैं। राजेश और नूपुर तलवार डेंटिस्ट हैं। रिहा होने से पूर्व वे जेल में क़ैदियों के दांतों का इलाज करते रहे। विजय बाबा योग की कक्षाएं लेते हैं। प्रशांत हार्डवेयर इंजीनियर हैं, जेल में कंप्यूटर से जुड़े हर मसले को सुलझाने में सबसे आगे रहते हैं। आशाराम गिरि ने जेल में ही अपनी एक गायन-मण्डली तैयार की और विवेक ने अपनी चित्रकला से जेल की दीवारों को सजाया।

लेखिका ने अपनी इस पुस्तक में कुछ क़ैदियों की कविताएं भी संकलित की हैं जिनमें से राजेश व नूपुर तलवार की कविताओं का अनुवाद उन्होंने स्वयं किया है। ये कविताएँ इन लोगों के जीवन में व्याप्त तमाम निराशा, हताशा, वेदना और पीड़ा के बावजूद इनकी चेतना में विद्यमान रचनात्मक ऊर्जा को व्यक्त करती हैं।

डॉ. नूपुर तलवार – सिर्फ़ चुप्पी

सिर्फ़ चुप्पी

क्यों इतना दर्द, क्यों इतनी नफ़रत

क्या कोई सच दिखाएगा अपना चेहरा

या फिर मेरी जान

इस चुप्पी के बीच कहीं सूख जाएगी

सवाल बहुत हैं

लेकिन जवाब में मुझे मिलती है

सिर्फ़ चुप्पी “

(वही, पृष्ठ 65)

गुड्डू गोसाईं – मेरा मन

“मेरा मन मुझसे कहता है

मैं भी एक इतिहास लिखूँ

अब तक जो दुनिया ने जाना

उससे भी कुछ ख़ास लिखूँ

* * *

इस देश की खातिर लोगों ने कितना खून बहाया है

किसी ने अपना भाई किसी ने अपना लाल गँवाया है

मर मिटे जो देश की ख़ातिर उनकी आख़िरी साँस लिखूँ”

(वही, पृष्ठ 125)

अरुण शर्मा – हौंसलों का विमान

“घेरेगा जब कोई तूफ़ान हमें, थोड़े से घबरायेंगे

साथ देगा तूफ़ान का आसमा, काले बादल मँडरायेंगे

* * *

हँसी के लम्हे अच्छे हैं, पर ना भूलो उन ग़मों को

आखिर में ये ग़म ही आगे चलने की राह दिखाएंगे”

(वही, पृष्ठ 133)

‘तिनका तिनका डासना’ पुस्तक जेल जीवन से जुड़े एक बेहद मार्मिक पहलू को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उभारती है। जेल का वह तबका जो अबोध है, निश्छल है, जिसे अपराध शब्द का अर्थ भी ज्ञात नहीं, अपनी स्थिति और नियति दोनों से बेखबर वे बच्चे हैं, जो या तो जेल में ही पैदा होते हैं या शैशव अवस्था में ही अपनी अपराधी माँओं के साथ जेल में रहने को विवश होते हैं। यह गनीमत है कि जेल में उत्पन्न होने वाले बच्चों का जन्मस्थान ‘जेल’ नहीं लिखा जाता। किन्तु उन्हें अपनी माँ के साथ अधिकाधिक छः वर्ष की उम्र तक रहने की इज़ाज़त होती है। उम्र के वे सबसे नाज़ुक और महत्त्वपूर्ण वर्ष जिनमें बच्चों के मानसिक विकास की नींव तैयार होती है, इन बच्चों को जेल में बिताने पड़ते हैं।

जेल ही उनकी जीवन-अध्ययन की पहली पाठशाला बन जाती है। लेखिका ने जेल के भीतर इन बच्चों के जीवन, रहन-सहन और वातावरण का ऐसा सजीव और मर्मस्पर्शी चित्रण किया है जिसे पढ़कर कठोर-से-कठोर हृदय भी द्रवित हुए बिना नहीं रह सकता।

“यह क्रेश है। नन्ही जानें यहाँ बड़ी तरतीब से बैठी हैं। पर उनकी शरारत नदारद है। ये बच्चे सिर्फ अपनी उम्र और आकार से बच्चे हैं । हंसी गायब है । समय से पहले बूढ़े हो गए हैं यह।” (वही, पृष्ठ 35)

“यहाँ खिलोने हैं थोड़े से। मिट्टी के ढेले से आकार बनाने की मस्ती इनमें पनपी ही नहीं है।

* * *

“सात रंग हाथ में थाम कर भी इन बच्चों को काला रंग ही ज्यादा दीखता है । या सब स्याह । रंगों को कहाँ पता कि उनकी पहचान का एक ताल्लुक इस बात से भी है कि उनसे परिचय कब और कहाँ करवाया जा रहा है । इन बच्चों ने इंद्रधनुष कहाँ देखे । इन्होनें माँ के साथ एकं काली परछाई देखी है । वही एक रंग है जो सपनों में इनका पीछा करता है । वही इनका परिचय कहता है । जाने कौन, कब इस काले रंग को पोंछेगा या पोंछेगा भी या नहीं ।” (वही, पृष्ठ 36)

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लेखिका के अनुसार जेल में रह रहे इन बच्चों को पढ़ने-लिखने की कुछ सुविधाएँ अवश्य मुहैया करवाई जाती हैं जिनसे उन्हें पाठशाला का आभास तो मिल जाता है, किन्तु ये बच्चे उत्साह और रोचकता से पूर्ण उन अनुभवों से वंचित ही रह जाते हैं, जो एक साधारण बालक को विद्यालयी जीवन में सहजता से मिल जाते हैं। विद्यालय ही नहीं, पारिवारिक और सामाजिक जीवन के ऐसे कितने ही छोटे-छोटे अनुभवों से ये अछूते ही रह जाते हैं जो बचपन की अमूल्य निधि हैं और जो उनके व्यक्तित्व के निर्माण का आधार हो सकते हैं। पुस्तक में प्रस्तुत वर्णन और विवरण चेतना के स्तर पर केवल हमें उद्वेलित ही नहीं करता वरन क्षुब्ध भी करता है। यह जहाँ एक और चिंतन और मनन के लिए विवश करता है, वहीं दूसरी और  इस सर्वथा उपेक्षित कर्म-क्षेत्र में सक्रिय होने को उत्प्रेरित भी करता है। लेखिका ने प्राप्त तथ्यों, आँकड़ों, शोध-रिपोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सन्दर्भ देते हुए जेलों में गर्भवती महिलाओं और बच्चों की उचित देखभाल की दिशा में सरकार और विभिन्न संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले प्रयासों का उल्लेख भी किया है किन्तु कुल मिलाकर स्थिति अब तक अत्यंत शोचनीय बनी हुई है। इस दिशा में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने के लिए यह ज़रूरी है कि केवल सरकार को दोषी ठहराने के स्थान पर प्रत्येक नागरिक संवेदनशील होकर सोचे और अपनी ठोस भूमिका का निर्वाह करे।

जेल जीवन का चित्रण करते हुए लेखिका ने विभिन्न प्रसंगों में जेल प्रशासन और अधिकारियों की सहृदयता और संवेदनशीलता का उल्लेख भी किया है। अनेक नियमों में बंधे होने पर भी इन अधिकारियों ने सकारात्मक रवैया अपनाते हुए कई ऐसे रचनात्मक कदम उठाए हैं, जिनसे सीमित स्तर पर ही सही, क़ैदियों के जीवन में बदलाव की आहट सुनाई पड़ने लगी है।

‘इंडिया विज़न फाउंडेशन’ (एक NGO) द्वारा डासना जेल में कंप्यूटर लैब की स्थापना को अनुमति देना जेल प्रशासन का ऐसा ही एक सकारात्मक निर्णय है। इसके अंतर्गत क़ैदियों के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण का सुचारु प्रबंध किए जाने से मानो उनमें एक नई स्फूर्ति और उत्साह का संचार हो गया है।

“उम्मीदों के सूखे संसार में एक टूटी हुई कलम या एकदम पुराना कंप्यूटर भी मन में बहुत-सी आशाएँ भर सकता है।”

* * *

“हालाँकि कंप्यूटर की एक बड़ी सुविधा बंदियों को बाहर की दुनिया से जोड़े रखने की हो सकती है लेकिन जेल के अपने कुछ नियम हैं । जेलें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर संवाद की अनुमति नहीं देती लेकिन तब भी कंप्यूटर से परिचय कम से कम समय के साथ बदलती तकनीक से चलने का सामर्थ्य तो देता ही है।”(वही, पृष्ठ 91)

कुल मिलाकर यह पुस्तक डासना जेल के माध्यम से एक ओर भारतीय जेलों में बंद क़ैदियों की विडम्बनापूर्ण स्थिति, समाज द्वारा इनके प्रति अपनाए जाने वाले तिरस्कार और उपेक्षापूर्ण रवैये को तो उजागर करती ही है, साथ ही कानून, मीडिया और व्यवस्था की भूमिकाओं पर भी तीखे सवाल उठाती है। यह भी उल्लेखनीय है कि लेखिका का नज़रिया नकारात्मक, हताशापूर्ण और निराशावादी नहीं है। उनका केंद्रीय सरोकार मात्र दोषारोपण और छिद्रान्वेषण करना नहीं, वरन अंधकारपूर्ण यथार्थ के बीच रौशनी की उस मद्धिम लौ को जलाए रखना है जिससे कल संभावनाओं का उजाला फैल सके। ‘तिनका तिनका डासना’ इस विश्वास को और सुदृढ़ करती है कि ‘एक दिया अनेक दियों को जला सकता है, ज़रूरत है बस शुरुआत करने की’।

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