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तिनका तिनका अवार्ड – सपनों को दोबारा बुनने का बल

Jyoti Anand

हालात और समय पर किसी का बस नहीं है | कई बार जीवन में आया तूफ़ान पूरी ज़िंदगी बिखेर देता है | कुछ ऐसा ही घटित होता है बंदियों के जीवन के साथ | जेल वो जगह है जहाँ पर कोई नहीं आना चाहता | यहाँ पर रहने वाले रहवासी समाज की अनदेखी का शिकार हैं | एक तो वो पहले हालात  से मजबूर है दूसरा समाज की अनदेखी का दंश उन्हें और घुटने पर मजबूर कर देता है | जेल से छूटने के बाद क्या उन्हें फिर से कोई अपनाएगा या क्या वो फिर से समाज की मुख्यधारा में शामिल हों पायेंगे इस बात को लेकर शायद वो हमेशा मानसिक दबाव में रहते हैं | ऐसे में ज़रूरत है किसी ऐसे प्रयास की जो जेल के साथ जुड़ कर वहां ही एक ऐसा  माहौल पैदा कर दे जिससे की सकारात्मक सोच की शक्ति के साथ घोर अन्धकार को भी आशा की किरणों में बदला जा सके | कुछ ऐसा ही अनथक प्रयास है तिनका तिनका | यह वो पवित्र मिशन है जिसने बंदियों के बीच जाकर कला और साहित्य के ज़रिये उनकी नकारात्मक सोच को खंगाला है और एक उम्मीद का दिया जगाया है | यह उम्मीद का दीया निसंदेह उनकी जिंदगियों को फिर से रोशन करेगा|

कहतें हैं  अपने सपनों को हमेशा जिंदा रखना चाहिए | प्रसिद्ध लेखक पाश के अनुसार ” जीवन में सब से खतरनाक होता है सपनों का मर जाना “| तिनका ने कला और साहित्य के ज़रिये बंदियों के  मरे हुए सपनोँ को फिर से जीवित किया है |

यही नहीं मानवाधिकार दिवस पर बंदियों की  कलाकारी को तिनका तिनका अवार्ड के ज़रिये प्रोत्साहित करना उन्हें और अच्छा इंसान बनने का बल देता है |

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आईये जानें २०१५ में हुई इनकी शुरुआत से बंदियों ने कैसे फिर से दोबारा अपने सपनों को दोबारा से बुना है , कैसे अपने मनोभावों को समाज के सामने उजागर किया है |

२०१५ में पहला तिनका तिनका अवार्ड हासिल करने वाले जयपुर की सेंट्रल जेल में बंद 35 वर्षीय राधा मोहन की कविता चाहत की यह  पंक्तियाँ “कभी खुद से नफरत होती है ,कभी ज़माने से होती है ,घोंट के गला मेरे अरमानों का ये दुनिया चैन से सोती है  “कैदियों की उस मानसिकता को बयाँ करती हैं जिनसे वो असल में गुज़र रहे हैं | मेरे ख़याल से ये एक कटाक्ष है दुनिया वालों पर जो सीमित सी दुनिया में विचरण करने वाले समाज से कटे इन लोगों तक असल में पहुँच ही नहीं करना चाहते |

तस्वीरों में भी जान होती है और हर तस्वीर अपने आप में कुछ बयान करती है |ऐसा ही कुछ रच डाला होगा सूरत की जेल में बंद पेशे से पत्रकार और कार्टूनिस्ट रह चुके 39 वर्षीय वीरेंदर विट्ठल भाई ने | this is my right कविता और उसके साथ बनायी एक तस्वीर के ज़रिये उसने देश की धीमी न्यायिक प्रणाली पर प्रहार किया है | उसकी कविता और तस्वीर के माध्यम से जेल और आज़ादी के बीच संघर्ष दिखाया गया है |

“द डेज आर डार्क” कविता के ज़रिये तीसरा पुरस्कार पाने वाले अहमदाबाद की जेल में बंद गोविंदभाई पटेल को जेल की सींखचों के बीच दैविक शक्ति से न्याय की आस है |

गलती को मान लेना और फिर उसे सुधारने की कोशिश करना बहुत बड़ी बात है | अपने मन की बात को बयाँ किया है २०१५ में ही विशेष पुरस्कार पाने वाले जयपुर जेल में बंद हनुमान सहाय ने अपनी कविता “नया बंदी और ज़िंदगी” के माध्यम से |

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इस दुनिया में कुछ असंभव नहीं है हम वो सब कर सकते हैं जो हम सोच सकते हैं इन पंक्तियों को चरितार्थ किया उत्तेर प्रदेश के शहर आगरा की जेल में बंदी बंटी उर्फ़ फ़िरोज़ ने | साबुन से विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ बनाने वाले इस कलाकार पेंटिंग और कला की श्रेणी में पहला पुरस्कार तो मिला ही साथ ही उसकी कृतियों को ललित कला अकादमी लखनऊ, रविन्द्रल्या लखनऊ और ताज महोत्सव आगरा में प्रदर्शित होने का मोका मिला |

इसी श्रेणी में दूसरा पुरस्कार पाने वाले उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जेल में कैद 28 साल के विचाराधीन कैदी अरविन्द कुमार की कोयले से बनायी हुई कृतियाँ रिहाई की उम्मीद थामे हुए हैं |

बात यही ख़तम नहीं होती कई और ऐसे भी हैं जिन्होंने तिनका तिनका से प्रेरणा लेकर  जेल में बंद होने के बावजूद खुद को साबित करने की कोशिश की है | उनमें एक नाम है २०१५ में ही चंडीगढ़ की मॉडल जेल में बंद मंजीत सिंह चौहान | जिन्होंने जेल में रहते हुए सनाताकोतर की पढाई पूरी की और” दी स्टोरी ऑफ अवेकनिंग ऑफ माय सोल” किताब लिखी |

जेल में सीमित से साधनों के बीच ज़िंदगी जी रहे बंदियों को तिनका तिनका ने उन्ही में खुश रहना सिखा दिया | तिनका तिनका अवार्ड के ज़रिये किसी को कवि का खित्ताब देना , किसी को लेखक का तो किसी को चित्रकार का ये बंदियों को एक नयी पहचान देने से कम नहीं साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नकारत्मकता को नकारात्मकता समाप्त नहीं कर सकती |

२०१६ में अपनी कविता छींटें के लिए पहला पुरस्कार पाने वाले  उत्तेर प्रदेश की जेल में बंदी 45 वर्षीय वैभव (पेशे से अध्यापक), कविता “फासला” के लिए दूसरा पुरस्कार पाने वाले  राजकोट गुजरात की जेल में बंदी 30 वर्षीय मनीषा राम, मैं कैद हूँ तो क्या हुआ मन मेरा आजाद है  कविता के ज़रिये तीसरा पुरस्कार पाने वाले आगरा जेल में बंदी दिनेश गौड़ अपने आप में उदहारण है कि सकारात्मकता की शुरुआत आशा विश्वास से होती है |

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तिनका तिनका के बारे में कहने को बहुत कुछ है शायद शब्द कम पड़ जाएँ | असल में यह जेल के बंदियों को समाज के साथ जोड़ने का एक प्रयास है | इसकी एक बात जो मुझे ख़ास लगी वो यह कि बंदियों के प्रति समाज का एक नया दृष्टिकोण बनना, ऐसा दृष्टिकोण जहाँ बंदियों के लिए घृणा छंट रही है | ऐसा दृष्टिकोण निसंदेह कैदियों को अपने जीवन में सुधार लाने का बल देगा |

जिससे  तिनका तिनका मुख्यत जेल के रहवासियों को समाज के साथ जोड़ने का एक प्रयास है | इस प्रयास के ज़रिये कैदियों ने अपनी भावनाओं को या तो पन्नों पर उतारना शुरू कर दिया है या रंगों के ज़रिये दीवारों पर उकेरना |

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