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तिनका – कैदियों के प्रति बदलता सामाजिक दृष्टिकोण

ज़िन्दगी का सफ़र आसान नहीं है ये एक रेलगाड़ी के समान है चलना जिसका काम है | जीवन के सफर में कभी सुख का स्टेशन आता है कभी दुःख का पर स्थाई कुछ नहीं है | सुख और दुःख फाटक से निकलती हुई रेलगाड़ी के समान है हम न दुःख का रास्ता रोक सकतें हैं और न ही सुख का, आगे बढना ही है |

अब अगर डासना जेल की बात की जाए तो सामने एक फाटक है जहाँ से तेज़ रफ़्तार से गाड़ी गुज़रती है और छन्न की आवाज़ कुछ क्षण कानों में गूंजती है |

बंदियों की स्थिति फाटक से गुज़रती रेलगाड़ी की तरह ही है,रेलगाड़ी तो झन्न कर के गुज़र जाती है पर बंदियों के जीवन में अचानक से जो घटित हुआ उसकी पीड़ा उन्हें ताउम्र झेलनी पड़ेगी | डासना में उनका समय उस तेज़ी से नहीं गुजरेगा जिस तेज़ी से एक रेल फाटक से गुज़र जाती है | उनकी ज़िंदगी में दुःख आकर ठहर गया है |

बंदियों के प्रति समाज का रुख साकारात्मक नहीं होता पर तिनका ने एक आस पैदा की है | तिहाड़ जेल के कैदी जिस अंदाज़ में परिचय गान को पेश कर रहें हैं निसंदेह वो किसी कलाकार से कम नहीं लग रहे | तिनका के एक प्रयास के ज़रिये उनका खुले आकाश के नीचे गाना मानो ऐसे लग रहा है जैसे की उनमें से नकारात्मकता निकल रही है और समाज जो उन्हें देख रहा है उनमें बंदियों के प्रति सकारात्मक सोच  का समावेश हो रहा है | उन्हें देख मेरे ख्याल से हर देखने वाले के मन में कुछ क्षण यह विचार आता होगा की वाकई ये अपराधी ही हैं |

जेलें समाज का एक नकारा हुआ पहलु हैं जहाँ पर कोई पहुँच नहीं करना चाहता हाँ देश में सोशल वर्क के नाम पर अखबारी सुर्खियाँ बटोरने वाले अनेकों मिल जायेंगे | दूसरी तरफ तिनका के ज़रिये बंदियों में जो विश्वास पैदा हुआ है, उनकी मर चुकी कलात्मकता फिर से प्रस्फुटित हुई है, उनमें जो संगीत के ज़रिये ,रंगों के ज़रिये अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने के जो अवसर पैदा हुयें हैं उसने असल में समाज को झिंझोड़ा है और एक अनदेखे वर्ग के लिए सोचने को मजबूर किया है |

                                                                                                                                   (ज्योति आनंद )

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