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आंखों में सपने संजोए बंदी: 14 पेट्रोल पंप, हजारों उम्मीदें…

तिनका तिनका :

वर्तिका नंदा

फरवरी 3, 2018

मैं जब हैदराबाद पहुंची, तब रात हो चुकी थी. बीच रास्ते गाड़ी चलाते ड्राइवर ने अचानक एक जगह गाड़ी रोकी और बोला- इसे देखिए. मैंने देखा कि वहां एक पेट्रोल पंप है और चार-पांच गाड़ियां कतार में अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं. यह बहुत साफ-सुथरा पेट्रोल पंप था. उस समय उसमें पांच लोग काम कर रहे थे. तब मुझे याद आया कि यह तेलंगाना का वह पेट्रोल पंप है जिसे जेल के बंदी चला रहे हैं. इण्डियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड के स्‍वामित्‍व में चलने रहा यह पंप पूरे देश में अपनी तरह की एक अलग मिसाल कायम कर रहा है.

इस समय तेलंगाना में 14 पेट्रोल पंपों का जिम्‍मा पूरी तरह से कैदियों के हाथों में है. कभी-कभी जेल के रिटायर्ड कर्मचारी भी इनकी मदद करते हैं. यहां काम करने वाले बंदी 3 शिफ्टों में इन पेट्रोल पंपों को रात-दिन चला रहे है. इसके अलावा 2 पेट्रोल पंप ऐसे हैं जिन्‍हें पूरी तरह से महिला बंदी चलाती हैं. इन बंदियों को अपने काम के एवज में 12 हजार रुपये का मासिक वेतन भी दिया जाता है. यह एक ऐसा वेतन है जिसकी कल्पना देश के किसी भी जेल का बंदी नहीं कर सकता. ये पेट्रोल पंप हर साल करीब 4 करोड़ रुपए का मुनाफा कमा रहे हैं. इस मुनाफे का उपयोग जेल के विकास कार्यो में किया जाता है.

तेलंगाना के जेल महानिदेशक विनय कुमार सिंह और यहां के सुप्रीटेंडेंट बी. सदैया कहते हैं कि हर साल 100 से 120 करोड़ रुपये का पेट्रोल यहां से बेचा जाता है. एक दिन की बिक्री करीब 28,000 से 30,000 लीटर की है. आज यह पेट्रोल पंप इतने सफल हैं कि आसपास के तमाम पेट्रोल पंपों ने अपनी सारी उम्‍मीद इन 14 पेट्रोल पंपों पर छोड़ दी है. हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये पेट्रोल पंप इन बंदियों के लिए एक बड़ी उम्‍मीद लेकर आए हैं लेकिन एक सच यह भी है कि बाहर से आने वाले लोग कई बार इन बंदियों के साथ बहुत बुरा बर्ताव करते हैं.

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एक दूसरा सच यह भी है कि आज तक इनमें से किसी भी कैदी ने यहां से भागने की कोशिश नहीं की. हर रोज इन कैदियों को जेल की बस में लाया जाता है. वे अपनी शिफ्ट को पूरा करते हैं और लौट जाते हैं. कुछ कैदी खुली जेल से भी आते हैं. एक पेट्रोल पंप खुली जेल के साथ एकदम सटा हुआ है. वे चलकर आते हैं और अपने आप लौट जाते हैं. उनके चेहरे पर खुशी साफ दिखती है. यहां काम करते तमाम बंदी अपनी आंखों में सपने संजोए हैं. उन्‍हें अब इस बात का विश्‍वास हो गया है कि जेल से बाहर जाने के बाद उन्‍हें बाकी बंदियों की तरह अपनी पहचान और अपने नाम को छिपाना नहीं होगा. उन्हें यकीन है कि उनकी सजा पूरी होने पर बाहर की दुनिया उन्‍हें स्‍वीकार कर लेगी और अगर किसी वजह से बाहर की दुनिया ने उन्हें स्‍वीकार नहीं भी किया तो भी तेलगांना के यह पेट्रोल पंप उन्‍हें एक नौकरी जरूर दे देंगे और आत्मविश्वास भी. इन बंदियों ने अपराध की दुनिया से जैसे अपना नाता तोड़ ही लिया है. इस पेट्रोल पंप ने उनके लिए वह कर दिखाया है जो मानवाधिकार के बड़े पाठ भी शायद न कर पाते.

जेल, सपने और कोशिश की एक लौ- जब तिनके जुड़ेंगे तो वाकई बदलाव की एक नई इबारत लिख डालेंगे.

तेलंगाना की यह यात्रा हमेशा याद रहेगी.

(डॉ. वर्तिका नन्दा  जेल सुधार विशेषज्ञ, सुपरिचित मीडिया शिक्षक और कैदियों के जीवन पर आधारित विशेष पुस्‍तक श्रृंखला ‘तिनका-तिनका तिहाड़’, ‘तिनका-तिनका डासना’ और ‘तिनका-तिनका आगरा’ की लेखिका हैं.)

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